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दिपावली के पर्व का सांस्कृतिक – आध्यात्मिक महत्व

दिपावली के पर्व का सांस्कृतिक – आध्यात्मिक महत्व

महापर्व दिपावली

भारतीय संस्कृति तथा हिन्दू धर्म के पर्व – त्यौहारों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण उत्सव है – दिपावली ! भारत के गुजरात जैसे कई प्रांतोने दिपावली – नूतनवर्ष को “नया साल” यानि NEW YEAR के रूप में मनाया जाता है। विक्रम सम्वत का प्रथम दिन -बलि प्रतिपदा है। वैसे तो दिपोत्सवी उत्सव; अश्विन कृष्ण एकादशी से ही प्रारम्भ हो जाता है। एकादशी से ले कर एकादशी तक चलने वाला यह सबसे बड़ा त्यौहार है, ऐसे भी कह सकते है।

रमा एकादशी से ही दीपोत्सव के स्वागत की तैयारी हो तजती है। घर – कार्यालय की साफसफाई तो पहले ही शुरू हो जाती है, जब बारी आती है घर या कार्यालय को सजाने की – घर की तरह मन को भी साफ़ करके उसको सद्गुणों से सजाने का सन्देश इससे ग्रहण करना आवश्यक है।

प्रारम्भ हुआ घर का श्रृंगार,
संगमे शुद्ध हो मनके विचार,
साफ़ सुथरे हो जीवन आचार,
मनाये ऐसे दिपावलीका त्यौहार।

वाकद्वादशी

एकादशी के बाद आता है त्योहार वाकद्वादशी ! वाकबारस का – मनुष्य को मिले हुए अमूल्य एवं अद्भुत शक्ति वाक् शक्ति (वाणी) है। वाणी को शिक्षण से परिश्कृत करना अच्छे विचारो के श्रवण से पवित्र करना एवं सम्बन्धो में माधुर्य लेन के लिए विवेकपूर्ण, शान्तियुक्त तथा प्रिय वचन से सुन्दर बनाना यह सब बातो पर विचार करके उसका आचरण करने का पर्व का नाम है वाकद्वादशी है। वाणी दीवार रूप नहीं बल्कि सेतु रूप बने ऐसा प्रयास हो ऐसा सन्देश इस पर्व से प्राप्त होता है।

 

धन्वन्तरि जयंती / धनतेरस

धन्वन्तरि जयंती को हम धन तेरस या धन त्रयोदशी के रूप में मनाते है। वास्तव में यह दिन “धन की पूजा करने का नहीं , परन्तु स्वस्थ्य प्रदान करने वाले धन्वन्तरि देवता के पूजन का दिन है। “स्वस्थ्य ही सबसे बड़ा धन है ” इस सिद्धांत को जीवन-व्यवहार में उत्तारनेवाले हमारे पुर्वजोने इसको “धन की पूजा ” मानने वाला दिन बताया है तो यह भी अनुचित नहीं है। धन्वन्तरि जयंती आयुर्वेद के नियमोंका जीवन पर्यँत पालन करनेका व्रत धारण करने का पर्व है। आयुर्वेद के अनुसार “जीवन चर्या ” या “लाइफ – स्टाइल ” को करने से ८० % से भी ज्यादा रोग तो आपने आप ही ठीक हो जायेंगे। रोगो के निदान से ले कर पुनः स्वास्थ्य प्राप्ति तक की समग्र प्रक्रिया के पीछे खर्च होनेवाला समग्र धन भी बचेगा। इस अर्थ में भी धन्वन्तरि जयंती को धनत्रयोदशी के रूप में मनाया या बताया गया हो तो उसमे भी जरासीभी अतिसयोक्ति नहीं है।

नरक – चतुर्दशी

धनत्रयोदशी के के बाद में आने वाला त्यौहार है नरक – चतुर्दशी !
आज के दिन भगवन श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षश का वध किया था। वध कर के १६१०० स्त्रिओंको उसके कारागृह से छुड़वाकर उन स्त्रियों को पत्नी का सन्माननीय स्थान दिया था – यह कथा प्रचलित है। नरकासुर का वध अर्थात काम -क्रोध एवं लोभ का हनन ।

 

” त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ,
कामः क्रोधस्तथा लोभम तस्मात् एतत त्रयं त्यजेत ”

(अ. १६ )

मनुष्य  के शत्रु ऐसे ये तीन प्रमुख विकारो पर विजय प्राप्त करने का कृष्ण-कार्य करना हमारे आध्यात्मिक पुरुर्षार्थ का लक्षण है। नरक – चतुर्दशी को ” काली-पूजन ” का दिन भी माना जाता है। महाकाली – शक्ति के देवता है – शक्ति सम्पादित करके स्वयं के ऊपर स्वयं के काम , क्रोध आदि विकारों के ऊपर विजय प्राप्त करना, यही “दीवाली पूर्व समूह ” में आने वाले इस पर्व का संदेश है। जीवन को नरक जैसो नहीं अपितु स्वर्ग सामान (सद्गुण, सद्विचार, सदाचार संपन्न ) बनाना यही सच्ची उत्सव विधि है।

 

दिवाली पर्व – दिपावली

दिवाली पर्व – अर्थात विक्रम सम्वंत वर्ष का अंतिम दिवस ! आज के दिन भगवन श्री रामचंद्र १४ वर्ष का वनवास पूर्ण करके पुनः अयोध्या में पधारे थे। लोगो ने उनके स्वागत के लिए दीप जलाये, रंगोलियां निकाली, फूल – पत्तो के बंधनवार लगाए, मिठाईयां बनायीं और एक – दूसरोकों बधाईयां दी। दिपावली के दिन ही भगवान महावीर स्वामी काल धर्म को प्राप्त हुए थे। भावदीप के विराम होने के पश्चात उनके भक्तो ने पर्याय दीपक जलाये और इस प्रकार दिपावली का पर्व जैन धर्म के तीर्थंकर के कल्याणक पर्व बना।

” जीवन भले ही अमावस की रात हो,
दिपक जले ज्ञान का , तो अंधकार मात हो।
दिपक जले प्रेम का, भक्ति का, सत्य धर्म का
जल जाए जीवनदीप, पूर्ण पुनः प्रभात हो। “

 

दिपावली की रात गयी, आया नूतन वर्ष का नवल प्रभात !
करे आज के दिन से हम एक अच्छे जीवन की सच्ची शुरुआत।

 

नूतन वर्ष – बलि प्रतिपदा – गोवर्धन पूजा

विक्रम सम्वत के वर्ष का प्रथम दिवस बलि प्रतिपदा के नाम से भी प्रसिद्ध है | आजके ही भगवान वामन ने बलि राजा से त्रिपदा भूमि का दान माँगा था ,और बलि को पाताल पहुँचाया था।
बलि के इस महान आत्मसमर्पण को अमर बनाने हमारे पूर्वजो ने इस दिन को बलि प्रतिपदा के रूप में मनाया। व्यक्ति मैं रहे हुए सद्गुणों को सम्मान देने की यह पावन परंपरा आज भी आवश्यक है। आज के ही दिन भगवन श्री कृष्ण ने गोकुल में “इन्द्र पूजा” के स्थान पर “गोवर्धन पूजा ” का प्रारम्भ करवाया था।
आज के सन्दर्भ में विचार करें तो ‘ गो -वर्धन पूजा ‘ अर्थात हमारे राष्ट्र में गौ (गाय ) रुपी धन का वर्धन हो, माने की गायें बढे, वृषभ आधारित कृषि हो, प्रत्येक गोशाला स्वावलंबी बने, तथा हर किसान के घर तो अवश्य गायें हो। गाय हमारे अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में पुनःस्थापित हो, यह आज के युग की सही ‘गोवर्धन-पूजा‘ होगी।

उसके बाद आता पर्व है –

यम द्वितीय (भैया-दूज )

आज के दिन भाई अपने बहन के यहाँ जाता है तथा यथा शक्ति उपहार देता है। भाई – बहन के पवित्र सम्बन्ध की महिमा को उजागर करनेवाला यह पर्व “रक्षा-बंधन” की तरह ही भारत की प्रायः सभी प्रांतो में मनाया जाता है। यमराजा आज ही के दिन अपनी बहन यमुना के यहाँ पधारे थे, इस लिए इस पर्व को ‘ यम द्वितीया ‘ भी कहा जाता है।
इसके पश्चात आने वाले मुख्य ३ पर्व , लाभ पंचमी (ज्ञान पंचमी ), गोपष्ठमी, तथा प्रबोधिनी एकादशी (तुलसी विवाह ) के विषय में आगामी दिनों में चिंतन करेंगे।

संस्कृति आर्य गुरुकुलम की और से आप सभी को दिपावली के त्यौहार और नए साल की बहोत बहोत शुभ कामनाएं ! आप सभी का आनेवाला वर्ष स्वास्थ्यपूर्ण, ज्ञानपूर्ण एवं आध्यात्मपूर्ण हो, यह परम शक्ति को प्रार्थना !

|| शुभम अस्तु ||
|| शुभ दिपावली ||
|| नूतन वर्ष अभिनन्दनम ||